समझ का फेर

कल अपने बारे में कुछ जाना - हमारे एक सहकर्मी ने विवाह के बाद फिर से ऑफिस ज्वाइन किया था और हम उसे बधाई दे रहे थे| बधाई के साथ साथ नए दुल्हे मियाँ की खूब खिंचाई भी हो रही थी. इसी हंसी मज़ाक में मुझे कुछ ऐसे शब्द सुनाई दिए जो मुझे अशोभनीय लगे - वजह थी कि उस कमरे में हमारे साथ एक महिला सहकर्मी भी थी और मुझसे ये बिलकुल बर्दाश्त नहीं हुआ कि वैसा मज़ाक किसी महिला की उपस्थिति में किया जाए.

मैं अत्यंत असहज होकर उस कमरे से निकल गया और मैंने क्रोधित होकर उन शब्दों को कहने वाले सहकर्मी को अलग से बुलाया. फिर उसे काफी खरी खोटी सुनायी. वह सहकर्मी हक्का-बक्का हो गया. उसके बाद मैंने उस कमरे में जाकर सभी को महिलाओं की उपस्थिति में संयमित व्यवहार करने एवं भाषा बरतने की सख्त हिदायत दी.

इसके बाद मैंने उस कमरे में बैठने वाले दो वरिष्ठ सहकर्मियों को भी बुलाया और उनसे सलाह मशविरा किया कि ऐसी घटनाओं में उनसे सहयोग अपेक्षित है और उन्हें ऐसे व्यवहार से सख्ती से निपटना चाहिए ताकि हमारी महिला सहकर्मी अपनी गरिमा के प्रति आश्वस्त होकर कार्य कर सकें.

उस बातचीत के दौरान उन्होंने मेरे क्रोध एवं चिंता के कारणों से अनभिज्ञता जाहिर की तो मुझे अटपटा लगा. जब मैंने और बात की तो मैं समझ गया कि एक साधारण मज़ाक का मैंने ही कुछ गलत अर्थ लगा लिया और गलत प्रतिक्रिया कर दी. शायद द्विअर्थी भाषा में मेरा दिमाग कुछ ज्यादा ही सक्रिय थी. खैर, मैंने अपनी गलती समझी और उन शब्दों को बोलने वाले अपने सहकर्मी को बुलाकर अपनी गलती कबूल की. मुझे आशा है कि वो मुझे माफ़ कर पायेगा.

मेरी गलतफहमी दूर करने के लिए मैं अपने सहकर्मियों का आभारी हूँ.